करवाचौथ (Karwachauth) क्या है | क्यों मनाया जाता है | इतिहास | पूजा विधि और मंत्र | शुभ मुहूर्त तथा व्रतकथा

करवाचौथ (Karwachauth) से सम्बन्धित जानकारी

हिन्दू पंचांग के अनुसार करवाचौथ का व्रत प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास से कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है | करवाचौथ दो शब्दों के मेल से बना है ‘करवा’ का अर्थ मिटटी का बर्तन तथा ‘चौथ’ का अर्थ चतुर्थी होता है| इस त्यौहार पर करवा का विशेष महत्व होता है, सभी सुहागिन महिलाये वर्ष भर इस त्यौहार का इंतज़ार करती है, तथा यह व्रत विशेष रूप से सुहागिन महिलाये अपने पति की लम्बी आयु तथा रक्षा के लिए रखती है| सुहागिन महिलाओ के आलावा कुवारी कन्याये भी इस व्रत को रखती है, सुहागिन महिलाये सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त के बाद चन्द्रमा की पूजा करने तक बिना अन्न-जल ग्रहण किये निर्जला व्रत रखती है| करवाचौथ का पूजन सभी सुहागिन महिलाये श्रद्धा पूर्वक तथा आस्था के साथ करती है, यह त्योहार पत्नी तथा पति के परस्पर प्रेम, स्नेह तथा विश्वास का प्रतीक है तथा यह त्योहार पति-पत्नी के रिश्ते को अधिक मजबूत बनाता है|  इस व्रत को रखने के पीछे कई धार्मिक मान्यताये है यहाँ आपको “करवाचौथ क्यों मनाया जाता है इसका इतिहास पूजा विधि,पूजा मंत्र, पूजा सामग्री, शुभ मुहूर्त तथा व्रतकथा के विषय में पूरी जानकारी” उपलब्ध कराई गयी है|

करवाचौथ की पूजा (Worship of Karvachauth)

करवाचौथ हिन्दुओ का मुख्य त्योहार है, यह व्रत सुहागिन सौभाग्यवती स्त्रियाँ रखती है|  करवाचौथ के व्रत में भगवान शिव, माता पार्वती, गणेश जी, कार्तिकेय तथा चन्द्रमा की पूजा की जाती है| सभी स्त्रियाँ पति की दीर्घायु तथा अखंड सौभाग्य के उद्देश्य से इस दिन भालचंद्र गणेश जी की पूजा करती है|करवाचौथ का व्रत किसी भी सम्प्रदाय, जाति तथा वर्ण की स्त्री रख सकती है, प्रत्येक सुहागिन स्त्री को यह व्रत रखने तथा पूजा करने का अधिकार है| यह व्रत आजीवन रखा जाता है, तथा यदि पूरे जीवन न रखना चाहे तो लगातार 12 वर्ष या 16 वर्ष यह व्रत करने के बाद उद्यापन किया जा सकता है| करवाचौथ की कथा सुनने से सुख, समृद्धि तथा शांति का वास होता  है, संतान सुख की प्राप्ति होती है, और सुहाग बना रहता है | चन्द्रमा को अर्द्धक देने से विचारो की नकारात्मकता समाप्त होती है, पति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है, साथ ही चन्द्रमा की स्थिति मजबूत होती है| इस दिन हाथो में मेहंदी लगाने का विशेष महत्व है, गहरी रची मेहँदी पति की लम्बी उम्र तथा अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक मानी जाती है | करवाचौथ के दिन सुहागिन स्त्रियाँ सोलह श्रृंगार कर के चन्द्रमा के निकलने पर पूरी विधि विधान से पूजा करती है, तथा पूजा सम्पन्न होने के बाद पति के हाथो से जल ग्रहण करके अपना व्रत खोलती है, तथा चरणस्पर्श कर पति तथा घर के बड़ो का आशीर्वाद लेती है|

करवाचौथ का इतिहास (History of Karwachauth)

मान्यता यह है कि करवाचौथ की परंपरा प्राचीन काल से देवताओं के समय से चली आ रही है। अनेको  प्राचीन कथाओं के अनुसार यह माना जाता है कि एक बार देव तथा दानवों के मध्य में युद्ध प्रारम्भ हो गया तथा उस युद्ध में देव हार रहे थे। ऐसे में चिंतित होकर सभी देवता ब्रह्मदेव के पास जाकर  रक्षा की प्रार्थना करने लगे। ब्रह्मदेव ने देवताओ को एक उपाय बताया और कहा कि इस संकट से बचने के लिए सभी देवो की पत्नियों को  व्रत रख कर पूरे ह्रदय से देवताओ की  विजय के लिए प्रार्थना करनी चाहिए | ऐसा करने पर निश्चित ही इस युद्ध में देवो की विजय होगी। ब्रह्मदेव के इस सुझाव को सुनकर सभी देवताओं और उनकी पत्नियो  ने खुश होकर स्वीकार कर लिया | ब्रह्मदेव के कथन अनुसार कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन सभी देवताओं की पत्नियों के द्वारा व्रत रखकर देवताओं की विजय के लिए प्रार्थना की | उनकी यह प्रार्थना स्वरूप  युद्ध में देवताओं की विजय हुई | उस समय आकाश में चन्द्रमा भी निकल आया था | इसके बाद सभी देवो की पत्नियों ने भोजन तथा जल ग्रहण कर अपना व्रत ख़ुशी -ख़ुशी खोला तभी से माना जाता है कि इसी दिन से करवाचौथ के व्रत की परंपरा प्रारम्भ हुई|

करवाचौथ की पूजा सामग्री (Worship Material for Karvachauth)

करवाचौथ की पूजा में लगने वाली सामग्री धातु तथा मिटटी का ढक्कन के साथ टोंटीदार करवा, जल के लिए लोटा, कच्चा दूध, दही, सिंदूर, धूपबत्ती, दीपक, अगरबत्ती, चन्दन, अक्षत, कुमकुम, रोली, देशी घी, चावल, चीनी, हल्दी, मिठाई, छलनी, आठ पूरिया, हलवा, मोदक तथा दक्षिणा के लिए पैसे आदि लगते है|

करवाचौथ की पूजा विधि (Worship Method of Karvachauth)

करवाचौथ  के दिन सूर्योदय से पहले सास के द्वारा अपनी बहू को सरगी दी जाती है, जिसमे थाली में मठरी, फल, मिठाई, सूखे मेवे तथा खीर होती है| यह सरगी प्रातःकाल सूर्योदय से पहले खाना होता है, तथा इसके बाद चाँद निकले के बाद पूजा करके ही कुछ खाया जा सकता है| सरगी का का चलन मुख्य रूप से पंजाबियों में है| हाथ में जल लेकर आचमन के बाद संकल्प करे पति तथा पुत्र के सौभाग्य एवं दीर्घायु प्राप्ति के लिए, करवा चौथ का व्रत करती है, तथा यह व्रत निराहार तथा निर्जला रखने पर अधिक लाभप्रद माना जाता है। करवाचौथ की पूजा में धातु तथा मिटटी के करवे का चलन होता है, करवा की साज-सज्जा कर 13 बिंदिया रखनी चाहिए, तथा पूजा में कथा के समय हाथ में 13 गेहू तथा चावल के दाने रखने चाहिए | चांदी के पात्र में पानी में दूध डालकर चन्द्रमा को अर्द्धक दिया जाता है | भगवान शिव-पार्वती, भगवान कार्तिकेय, गणेश जी तथा चंद्रदेव की पूजा की जाती है| देवताओ की मूर्ति न होने पर सुपारी में नाड़ा बांधकर भगवान की भावना के साथ पूजन किया जाता है, तथा शुद्ध घी में आटे को भूनकर या भीगे चावल को पीस कर उसमे चीनी  मिलाकर मोदक (लड्डू) नैवेद्य के लिए बनाये जाते है करवे में चूरा, गट्टा, तथा मोदक डाले जाते है तथा चंद्रमाँ के निकलने पर चन्द्रमा  को छलनी से देख कर सभी पूजा सामग्री के साथ पूजा संपन्न कर तथा भोग लगा कर चाँद को अर्द्धक दिया जाता है| इसके बाद पति के हाथो से जल ग्रहण करके व्रत खोला जाता है|

करवाचौथ की पूजा मंत्र (Worship Mantra for Karwachauth)

पूजा के समय देवी तथा देवताओ के लिए इन मंत्रो का जाप करे तथा नैवेद्य अर्पित कर करवाचौथ की व्रत कथा कहनी या सुननी चाहिए| मंत्र इस प्रकार है:-

  • “ॐ शिवायै नमः”माता पार्वती का मंत्र है|
  • “ॐ नमः शिवाय”से भगवान शिव का जाप करे|
  • “ॐ षण्मुखाय नमः”स्वामी कार्तिकेय का मंत्र है
  • “ॐ गणेशाय नमः”भगवान गणेश जी का मंत्र है इसका जाप करे| 
  • “ॐ सोमाय नमः”से  चंद्रमा का जाप करे|

करवाचौथ की पूजा का शुभ मुहूर्त 2020 (Auspicious Time to Worship Karvachauth in 2020)

  • यह व्रत चतुर्थी तिथि को 4 नवंबर की  सुबह 03:24 मिनट से 5 नवंबर की  सुबह 05:14 मिनट तक रहेगा|
  • करवा चौथ पूजा मुहूर्त- सायकल  5:29 मिनट से 6 बजकर 48 मिनट तक रहेगा|
  • चन्द्रमा का उदय – रात 8:16 मिनट तक होगा ।

करवाचौथ की व्रतकथा (Story of Karvachauth)

प्रथम कथा (First Story)

बहुत समय पहले की बात है, एक पतिव्रता स्त्री जिसका नाम करवा तथा अपने पति के साथ नदी के किनारे एक गाँव में रहती थी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान कर रहा था, उसी समय एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया। वह अपनी पत्नी को करवा-करवा कह के पुकारने लगा। उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी करवा दौड़ कर आई और आकर मगरमच्छ को कच्चे धागे से बाँध दिया। मगरमच्छ को बाँधकर यमराज के पास लेकर गयी और यमराज से बोली – हे भगवन! मगर ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है, इसलिए इस  मगर को आप अपनी शक्ति से नरक में ले जाओ | यमराज ने कहा अभी मगर की आयु शेष है इसलिए इसे मैं उसे नहीं मार सकता। इस पर करवा ने कहा, यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो मैं आप को श्राप देकर नष्ट कर दूँगी। यह सुनकर यमराज डर गए तथा मगर को यमपुरी भेज दिया| साथ ही करवा के पति को दीर्घायु प्रदान की हे करवा माता! जिस प्रकार आपने अपने पति की रक्षा की, वैसे ही सबके पतियों की रक्षा करना।

द्वितीय कथा (Second Story)

करवाचौथ की प्रचलित एक और पौराणिक कथा के अनुसार, एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी, उसकी बेटी का नाम करवा था। एक बार साहूकार की बेटी का करवा चौथ का व्रत मायके में पड़ा। जब रात में सभी भाई खाना खा रहे थे, तो उन्होंने अपनी बहन से भी खाना खाने के लिए कहा, लेकिन करवा ने खाना खाने से मना कर दिया और कहा कि अभी चांद नहीं निकला है | चांद को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोलेगी तथा खाना खाएगी। भाइयों को  भूखी-प्यासी बहन की हालत देखी नहीं गई। उसी समय सबसे छोटे भाई ने दूर एक पीपल के पेड़ में दीपक जलाकर  छलनी लेकर  पेड़ पर चढ़ गया। भाईयों ने करवा से कहा देखो चांद निकल आया है और उसे अपना व्रत तोड़ने के लिए कहा, और करवा ने पूजा संपन्न कर खाना खा लिया|  खाना खाते ही करवा के पति की मृत्यु का समाचार आया | तब उसके भाईयो के द्वारा किये गए छल का पता चलने पर, करवा पति के शव को एक साल लेकर बैठी रही और उसके ऊपर उगने वाली घास को हटाती रही |अगले साल करवा चौथ का व्रत रखकर फिर से पूरे विधि विधान के साथ पूजा की। जिसके फलस्वरूप करवा का पति फिर से जीवित हो गया। हे करवा माता! जिस प्रकार आपने अपने पति की रक्षा की, वैसे ही सबके पतियों की रक्षा करना।

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